झारखंड-बिहार व उत्तर प्रदेश में जितिया पर्व पर माछ–मड़ुआ का है खास महत्व
साहिबगंज : सनातन संस्कृति में अपने संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए जितिया व्रत की पुरातन परंपरा रही है। झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस जितिया पर्व में माताएं पूरी एक तिथि निर्जला उपवास रखकर जीमूतवाहन की आराधना करती हैं।
इस व्रत की शुरुआत एक खास और अनोखी परंपरा से होती है, जो व्रत से एक दिन पहले निभाई जाती है। माछ और मड़ुआ का सेवन जितिया व्रत से एक दिन पहले होता है, जो ‘नहाय-खाय’ का हिस्सा होता है। इसे माछ-मड़ुआ कहते हैं। वैष्णव संप्रदाय के लोग मछली की जगह नोनी साग खाते हैं।
यह जीवित्पुत्रिका व्रत का एक खास हिस्सा है, जो संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। यह झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रचलित है और व्रत की तैयारी के तौर पर नहाय-खाय के दिन किया जाता है। रविवार सुबह सूर्योदय से पूर्व महिलाएं ओठगन (अल्पाहार) करके निर्जला व्रत की शुरूआत करेंगी।
व्रत से एक दिन पूर्व खासकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मड़ुआ की रोटी और मछली खाने और वितरित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके पीछे मान्यता है कि कोई भी महिला इस दिन मछली खाने से वंचित न रह जाए।
रविवार को निर्जला व्रत शुरू करने से पहले शनिवार को महिलाएं परंपरागत मान्यताओं के अनुसार मड़ुआ की रोटी और मछली का सेवन करेंगी। हर व्रती को माछ-मड़ुआ उपलब्ध हो, इस लिए यह मान्यता है कि इस दिन जो जितना बांटता है, उसके संतान की आयु में उतनी बढ़ोत्तरी होती है।

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