"सतपुतिया": जिसके बिना जितिया पर्व है अधूरा, SBG न्यूज की ओर से सभी माताओं, बहनों, बेटियों को जितिया महापर्व की शुभकामनाएं
साहिबगंज : गाँव की गलियों में जब बरसात की बयार बहती है, खेतों की मेड़ों पर हरी-भरी बेलें लहराने लगती हैं। इन्हीं बेलों से झाँकती है छोटी-छोटी हरी सब्ज़ियाँ, जिसे हमलोग 'सतपुतिया' के नाम से जानते हैं। कोई इसे तोरई कहता है, कोई झींगी, परंतु हमारे यहां इसे बेहद प्यार से "सतपुतिया" कहते हैं।
क्योंकि यह सिर्फ एक सब्जी ही नहीं है बल्कि इससे एक भावनात्मक लगाव है। पुरानी कहानियों में राजा के अक्सर सात पुत्र हुआ करते थे। उसी स्मृति से इसका नाम पड़ा "सतपुतिया", यानी सात संतानें। सच भी यही है, इसके फल प्रायः सात के गुच्छे में लटकते हैं।
छोटे-छोटे, बस चार अंगुल लंबे, हरे-भरे ये फल मानो बच्चों-से मासूम लगते हैं। झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार की माताएँ जब पुत्र के दीर्घ जीवन और अच्छे स्वास्थ्य के लिए ज्यूतिया या जितिया व्रत रखती हैं, तो उनके थाल में सतपुतिया की सब्ज़ी का होना अनिवार्य माना जाता है।
यही कारण है कि व्रत के दिन गाँव से लेकर शहरों की मंडी में इसकी पूछ बढ़ जाती है। और जहाँ इसकी खेती नहीं होती, वहाँ तो यह सब्ज़ी सोने के भाव बिकती है। सुबह से शाम तक केवल एक दिन के लिए ही दिखाई देती है। सतपुतिया का कोई अलग खेत नहीं होता।
यह गन्ने-मक्के की फसलों के बीच, मेड़ों पर, या छप्पर-टाटी पर बेल बनाकर पनप जाती है। डंडे गाड़कर रस्सी बांध दीजिए, फिर देखिए कैसे यह बेल आसमान छूने लगती है। संध्या समय इस पर जब छोटे-छोटे पीले फूल खिलते हैं, तो तितलियाँ और भौंरे गुनगुनाते हुए इसकी शोभा बढ़ा देते हैं।
सतपुतिया सिर्फ एक सब्ज़ी नहीं, यह ग्रामीण जीवन का एक हिस्सा है। इसमें आस्था की महक है, खेतों की मिट्टी की सोंधी गंध है और बचपन की रसोई का स्वाद भी। यही वजह है कि यह थाली में आते ही न सिर्फ भूख मिटाती है, बल्कि मन को भी तृप्त कर जाती है।
SBG न्यूज की ओर से सभी माताओं, बहनों, बेटियों को ज्यूतिया व्रत की ढेर सारी शुभकामनाएं...

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